फ्रांस की सड़कों पर एक बार फिर जनता का गुस्सा फूट पड़ा है। महंगाई, महंगे ईंधन और सरकारी सेवाओं में कटौती के खिलाफ शुरू हुआ प्रदर्शन अब हिंसक टकराव तक पहुंच गया है। पेरिस समेत कई शहरों में आगजनी, दुकानों में लूट और पुलिस के साथ झड़पें हुईं। प्रधानमंत्री ने 1,200 लोगों की गिरफ्तारी की जानकारी दी है। लेकिन इस आंदोलन की जड़ें सिर्फ महंगाई तक सीमित नहीं हैं। आखिर फ्रांस में ऐसा क्या हुआ कि छात्र, मजदूर और आम नागरिक एक साथ सड़कों पर उतर आए? आगे पढ़ें पूरी खबर।

फ्रांस में क्यों भड़का विरोध प्रदर्शन?
फ्रांस में शनिवार, 17 अक्टूबर को महंगाई और जीवन-यापन की बढ़ती लागत के खिलाफ देशव्यापी प्रदर्शन हुए। राजधानी पेरिस सहित कई शहरों में बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे। प्रदर्शनकारियों ने ईंधन की बढ़ती कीमतों, आम लोगों की घटती क्रय शक्ति, सरकारी खर्च में कटौती और सार्वजनिक सेवाओं की खराब स्थिति के खिलाफ आवाज उठाई।
रॉयटर्स के मुताबिक, फ्रांस के गृह मंत्री ने देशभर में करीब 5.5 लाख प्रदर्शनकारियों के शामिल होने का अनुमान दिया, जबकि मजदूर संगठन CGT ने यह संख्या करीब 8 लाख बताई।
स्कूलों की बदहाली से शुरू हुआ आंदोलन
इस आंदोलन की शुरुआत सितंबर में पेरिस के गरीब उत्तरी इलाकों के स्कूलों में विद्यार्थियों के विरोध से हुई थी। छात्रों ने शिक्षकों की कमी, खराब स्कूल भवनों और पढ़ाई के लिए जरूरी सुविधाएं न मिलने पर नाराजगी जताई।
धीरे-धीरे यह विरोध स्कूलों तक सीमित नहीं रहा। मजदूर संगठनों, शिक्षकों और अन्य नागरिकों ने भी इसमें भाग लेना शुरू कर दिया। आंदोलन में असमानता, सरकारी खर्च, महंगाई और आम लोगों के जीवन स्तर जैसे मुद्दे शामिल हो गए।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि बढ़ती कीमतों के बीच आम परिवारों के लिए रोजमर्रा का खर्च उठाना मुश्किल हो रहा है। ईंधन की कीमतों और शिक्षा तथा अन्य सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति ने लोगों की नाराजगी को और बढ़ाया है।
पेरिस समेत कई शहरों में हिंसा और आगजनी
प्रदर्शन के दौरान पेरिस, मार्सेई, लियोन और लिमोज जैसे शहरों में हिंसक घटनाएं सामने आईं। पुलिस ने कुछ स्थानों पर आंसू गैस का इस्तेमाल किया। कई जगह दुकानों में लूटपाट और सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने की खबरें आईं।
लिमोज में सिटी हॉल में आग लगने की घटना सामने आई। मार्सेई में प्रदर्शनकारियों ने नगर प्रशासन की इमारत में घुसकर तोड़फोड़ की, जबकि लियोन में पर्यटन कार्यालय को आग के हवाले किए जाने की खबर आई।
हालांकि प्रदर्शन में शामिल लोगों की बड़ी संख्या शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें रख रही थी। हिंसा में शामिल समूहों और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के बीच अंतर करना जरूरी है।
1,200 गिरफ्तारियों का दावा, पुलिसकर्मी भी घायल
फ्रांस के प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने शनिवार शाम करीब 1,200 लोगों की गिरफ्तारी की जानकारी दी। वहीं, एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट में गृह मंत्री के हवाले से करीब 400 गिरफ्तारियों का आंकड़ा दिया गया। अलग-अलग रिपोर्टों में समय और आंकड़ों का अंतर है, इसलिए गिरफ्तारी की अंतिम संख्या की आधिकारिक पुष्टि जरूरी है।
प्रधानमंत्री ने हिंसा की निंदा करते हुए कहा कि सरकार को हिंसा के जरिए दबाव में नहीं लाया जा सकता। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी हिंसक घटनाओं में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही।
सरकारी जानकारी के मुताबिक, प्रदर्शन के दौरान 150 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए। पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठे हैं। कुछ प्रदर्शनकारियों के घायल होने और पुलिस के बल प्रयोग की जांच की खबरें सामने आई हैं।
मैक्रों सरकार के सामने बढ़ी चुनौती
फ्रांस में बढ़ती महंगाई और सार्वजनिक सेवाओं को लेकर नाराजगी ऐसे समय सामने आई है, जब देश आर्थिक दबाव और राजनीतिक अस्थिरता का सामना कर रहा है।
सरकार सार्वजनिक कर्ज कम करने के लिए खर्च में कटौती की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर, प्रदर्शनकारी चाहते हैं कि शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सार्वजनिक सेवाओं पर पर्याप्त खर्च किया जाए और आम लोगों पर बढ़ती कीमतों का बोझ कम हो।
आंदोलन ने फ्रांस की राजनीति में भी दबाव बढ़ाया है। अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले सरकार के लिए जनता की नाराजगी को शांत करना एक बड़ी चुनौती बन गया है।
क्या आंदोलन और बड़ा हो सकता है?
फ्रांस में मौजूदा विरोध को 2018 के येलो वेस्ट आंदोलन की याद से भी जोड़कर देखा जा रहा है। उस आंदोलन की शुरुआत ईंधन करों के विरोध से हुई थी, लेकिन बाद में वह महंगाई और आर्थिक असमानता के खिलाफ व्यापक आंदोलन बन गया था।
इस बार भी छात्रों, मजदूर संगठनों और आम नागरिकों की मांगें कई मुद्दों पर एक साथ आ रही हैं। हालांकि आंदोलन का आगे क्या रूप होगा, यह सरकार की प्रतिक्रिया, प्रदर्शनकारियों की मांगों और आने वाले दिनों की घटनाओं पर निर्भर करेगा।

