Nana Patekar Biography: नाना पाटेकर भारतीय सिनेमा के उन चुनिंदा कलाकारों में शामिल रहे, जिन्होंने अपनी अलग आवाज, दमदार संवाद अदायगी और शानदार अभिनय से दर्शकों के दिल में खास जगह बनाई। उनका जीवन संघर्षों से भरा रहा। कभी परिवार की आर्थिक मदद के लिए महज 13 साल की उम्र में काम करने वाले नाना पाटेकर ने आगे चलकर राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, फिल्मफेयर पुरस्कार और पद्मश्री जैसे सम्मान हासिल किए।
नाना पाटेकर का जन्म और परिवार
नाना पाटेकर का असली नाम विश्वनाथ पाटेकर था। उनका जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड-जंजीरा में हुआ था। उनके पिता दिंकर पाटेकर कपड़ा और टेक्सटाइल से जुड़े व्यवसाय में थे, जबकि उनकी मां गृहिणी थीं। नाना का बचपन बहुत आसान नहीं था। जब वह करीब 13 साल के थे, तब उनके परिवार को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। परिवार की स्थिति खराब होने के बाद उन्हें छोटी उम्र में ही काम करना पड़ा।
13 साल की उम्र में करने लगे थे काम
नाना पाटेकर ने अपने संघर्ष के दिनों के बारे में कई बार बताया था कि वह स्कूल के बाद मुंबई में फिल्म पोस्टर पेंट करने का काम करते थे। वह कई किलोमीटर पैदल चलकर काम पर जाते थे और इसके बदले उन्हें करीब 35 रुपये महीने और एक वक्त का खाना मिलता था। कम उम्र में गरीबी और संघर्ष को करीब से देखने का असर आगे चलकर उनके अभिनय पर भी दिखाई दिया। उनके अभिनय में आम आदमी की तकलीफ, गुस्सा और भावनाएं बेहद स्वाभाविक नजर आती थीं।
पढ़ाई और थिएटर से जुड़ाव
नाना पाटेकर ने मुंबई के Sir J.J. Institute of Applied Art से पढ़ाई की। पढ़ाई के दौरान ही उनका झुकाव थिएटर और अभिनय की ओर बढ़ा। उन्होंने रंगमंच पर कई नाटकों में काम किया। थिएटर ने उन्हें अभिनय की मजबूत नींव दी और यहीं से उनके फिल्मी सफर का रास्ता तैयार हुआ। नाना के लिए थिएटर सिर्फ करियर नहीं था, बल्कि अभिनय सीखने की पहली पाठशाला थी।
फिल्मों में कैसे हुई एंट्री?
नाना पाटेकर ने सीधे किसी बड़े स्टार की तरह फिल्म इंडस्ट्री में कदम नहीं रखा। उन्होंने पहले थिएटर में अपनी पहचान बनाई और इसके बाद फिल्मों में छोटे और सहायक किरदार निभाने शुरू किए। उनकी पहली प्रमुख हिंदी फिल्म ‘गमन’ (1978) मानी जाती है। शुरुआत में उन्हें बड़े रोल नहीं मिले, लेकिन उन्होंने छोटे किरदारों में भी अपनी छाप छोड़नी शुरू कर दी। इसके बाद उन्होंने कई फिल्मों में काम किया और धीरे-धीरे फिल्म इंडस्ट्री में उनकी पहचान एक गंभीर और प्रतिभाशाली अभिनेता के तौर पर बनने लगी।
‘परिंदा’ ने बदली जिंदगी
नाना पाटेकर के करियर में साल 1989 बेहद महत्वपूर्ण रहा। विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म ‘परिंदा’ में उन्होंने गैंगस्टर ‘अन्ना’ का किरदार निभाया। उनके अभिनय को दर्शकों और समीक्षकों ने खूब सराहा। इस फिल्म के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। ‘परिंदा’ के बाद नाना पाटेकर को बॉलीवुड के प्रमुख अभिनेताओं में गिना जाने लगा।
‘क्रांतिवीर’ में दिखा अभिनय का सबसे दमदार रूप
साल 1994 में आई फिल्म ‘क्रांतिवीर’ नाना पाटेकर के करियर की सबसे यादगार फिल्मों में शामिल है। फिल्म में उन्होंने प्रताप नारायण तिलक का किरदार निभाया। उनकी दमदार आवाज, संवाद बोलने का अंदाज और भावनात्मक अभिनय ने इस किरदार को बेहद लोकप्रिय बना दिया। ‘क्रांतिवीर’ के लिए नाना पाटेकर को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार मिला।
विलेन से लेकर कॉमेडी तक, हर किरदार में अलग पहचान
नाना पाटेकर की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि उन्होंने खुद को किसी एक तरह की भूमिका तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने ‘परिंदा’ में खतरनाक विलेन का किरदार निभाया तो ‘क्रांतिवीर’ में नायक की भूमिका निभाई। ‘अब तक छप्पन’ में पुलिस अधिकारी के किरदार में नजर आए और ‘वेलकम’ में उदय शेट्टी बनकर दर्शकों को खूब हंसाया। उनकी प्रमुख फिल्मों में अंकुश, प्रतिघात, परिंदा, प्रहार, तिरंगा, क्रांतिवीर, अग्निसाक्षी, खामोशी: द म्यूजिकल, शक्ति, अब तक छप्पन, अपहरण, वेलकम, राजनीति, वेलकम बैक और नटसम्राट जैसी फिल्में शामिल हैं।
नाना पाटेकर ने निर्देशन भी किया
नाना पाटेकर सिर्फ अभिनेता ही नहीं बल्कि निर्देशक भी रहे। उन्होंने ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ (1991) का निर्देशन किया था। फिल्म के लिए उन्होंने सैन्य प्रशिक्षण भी लिया था। सेना और सैनिकों के प्रति उनका जुड़ाव बाद के वर्षों में भी दिखाई देता रहा।
सेना से रहा खास रिश्ता
नाना पाटेकर ने Territorial Army में प्रशिक्षण लिया और सेना से जुड़े रहे। कारगिल युद्ध के दौरान भी उन्होंने सैनिकों के बीच जाकर समय बिताया था। उनका सेना के प्रति जुड़ाव उनके व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।
नीलकांति पाटेकर से हुई शादी
नाना पाटेकर की शादी नीलकांति पाटेकर से हुई थी। दोनों की मुलाकात थिएटर के दौरान हुई थी और बाद में दोनों ने शादी कर ली। दोनों का एक बेटा मल्हार पाटेकर है, जो फिल्म निर्माण से जुड़ा रहा है। नाना का निजी जीवन हमेशा मीडिया की चमक-दमक से काफी दूर रहा। उन्होंने अपनी निजी जिंदगी को लेकर ज्यादा चर्चा में रहने के बजाय अपने काम को प्राथमिकता दी।
बेटे के निधन का दर्द
नाना पाटेकर के निजी जीवन में एक बेहद दर्दनाक घटना भी आई। उनके पहले बेटे दुर्वासा का कम उम्र में निधन हो गया था। इसके बाद उनके बेटे मल्हार हुए। बेटे को खोने का दर्द उनके जीवन की सबसे कठिन व्यक्तिगत घटनाओं में से एक रहा।
सामाजिक कार्यों से भी जुड़े रहे
नाना पाटेकर ने फिल्मों के अलावा सामाजिक कार्यों में भी योगदान दिया। उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर नाम फाउंडेशन (Naam Foundation) से जुड़कर किसानों और सूखा प्रभावित लोगों की मदद के लिए काम किया। वह कई बार किसानों और जरूरतमंद परिवारों की सहायता के लिए आगे आए।
‘नटसम्राट’ में फिर साबित की अभिनय की ताकत
मराठी फिल्म ‘नटसम्राट’ (2016) में नाना पाटेकर ने एक बुजुर्ग रंगमंच अभिनेता का किरदार निभाया। यह भूमिका उनके थिएटर से पुराने रिश्ते को भी याद दिलाती है। फिल्म में उनके अभिनय को काफी सराहा गया और उन्हें मराठी सिनेमा में भी महत्वपूर्ण सम्मान मिले।
नाना पाटेकर को मिले प्रमुख सम्मान
नाना पाटेकर को अपने लंबे करियर में कई बड़े पुरस्कार मिले। इनमें प्रमुख हैं:
- 3 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार
- 4 फिल्मफेयर पुरस्कार
- फिल्मफेयर मराठी पुरस्कार
- महाराष्ट्र राज्य फिल्म पुरस्कार
- 2013 में पद्मश्री
उन्होंने हिंदी और मराठी दोनों सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाई।
नाना पाटेकर की फिल्मी विरासत
नाना पाटेकर का फिल्मी सफर लगभग पांच दशक तक फैला रहा। उन्होंने करीब पांच दशकों के करियर में अलग-अलग तरह के किरदार निभाए और यह साबित किया कि अभिनय केवल हीरो या विलेन बनने तक सीमित नहीं है। उनकी आवाज, संवाद अदायगी और अभिनय की सहजता उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी। 13 साल की उम्र में परिवार की आर्थिक मदद के लिए फिल्म पोस्टर पेंट करने वाले एक बच्चे से लेकर भारतीय सिनेमा के सम्मानित कलाकार और पद्मश्री पुरस्कार विजेता बनने तक नाना पाटेकर की कहानी संघर्ष और सफलता की ऐसी कहानी है, जो लंबे समय तक याद की जाएगी।
नाना पाटेकर का नाम भारतीय सिनेमा के उन कलाकारों में हमेशा लिया जाएगा, जिन्होंने स्टार बनने से ज्यादा एक बेहतरीन अभिनेता बनने को महत्व दिया।

